विराट उवाच उपपन्नं कुरुश्रेष्ठे कुन्तीपुत्र धनंजये | य एवं धर्मनित्यश्न जातज्ञानश्ष पाण्डव:,विराट बोले--पार्थ! आप कौरयवोंमें श्रेष्ठ और कुन्तीदेवीके पुत्र हैं। धनंजयमें इस प्रकार धर्मका विचार होना उचित ही है। पाण्डुपुत्र अर्जुन ही इस प्रकार नित्यधर्मपरायण और ज्ञानसम्पन्न हो सकते हैं। अब इसके बाद जो कर्तव्य आप ठीक समझें, उसे पूर्ण करें। मेरी सब कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। जिसके सम्बन्धी अर्जुन हो रहे हों, उसकी कौन-सी कामना अपूर्ण रह सकती हैं?
virāṭa uvāca | upapannaṃ kuruśreṣṭhe kuntīputra dhanaṃjaye | ya evaṃ dharmanityaś ca jātajñānaś ca pāṇḍavaḥ | ataḥ paraṃ yat kartavyaṃ manyase tat samācarāḥ | mama sarvāḥ kāmanāḥ pūrṇāḥ | yasya sambandhī arjuno bhavati tasya kāmāḥ kathaṃ na pūryeran |
វិរាដបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «វាសមគួរណាស់ហើយ ឱ ធនញ្ជយ—អ្នកល្អឥតខ្ចោះក្នុងចំណោមកុរុ និងជាកូនរបស់គុនទី។ ការគោរពធម៌ជានិច្ច និងការវិនិច្ឆ័យដ៏ចាស់ទុំបែបនេះ សមនឹងបណ្ឌវៈដូចអ្នក។ ដូច្នេះ ចូរធ្វើតាមអ្វីដែលអ្នកយល់ថាជាវិធីសមរម្យ។ បំណងប្រាថ្នាទាំងអស់របស់ខ្ញុំបានសម្រេចហើយ; អ្នកណាមានអារជុនជាសាច់ញាតិ តើបំណងអ្វីនឹងនៅមិនសម្រេចទៀត?»
विराट उवाच