चिरदृष्टोडयमस्माश्रि: प्रज्ञावान् बान्धवप्रिय: । अतीव ज्वलितो लक्ष्म्या पाण्डुपुत्रो धनंजय:,बन्धु-बन्धवोंको प्रिय लगनेवाले परम बुद्धिमान् अर्जुनको आज हमने दीर्घकालके बाद देखा है। अहा! पाण्डुपुत्र धनंजय अपनी दिव्य लक्ष्मी (शोभा) से अत्यन्त प्रकाशित हो रहे हैं
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द्रोण उवाच