Nakula’s Reception in Matsya: Appointment as Aśvasūta
Horse-master
स्रग्वी सुकेश: परिधाय चान्यथा शुशोभ धन्वी कवची शरी यथा । आरुह्य यानं परिधावतां भवान् सुतैः समो मे भव वा मया सम:,“तात! तुम शक्ति और धैर्यसे सम्पन्न देवोपम पुरुष हो। तुम्हारी अंगकान्ति श्याम है। तुम तरुण हो और हाथियोंके यूथके अधिपति महान् गजराजके समान शोभा पा रहे हो। तुमने हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ पहनकर उनके ऊपर सोनेके सुन्दर कंगन डाल लिये हैं, वेणी खोलकर केशोंकी लटें छितरा ली हैं तथा कानोंमें कुण्डल धारणकर गलेमें गजरा डाल रखा है। तुम्हारे केश बहुत ही सुन्दर हैं। तुम नारीजनोचित वेश-भूषा धारण करके भी उसके विपरीत धनुष-बाण और कवच धारण करनेवाले वीरके समान शोभा पा रहे हो। तुम रथ आदि वाहनोंपर बैठकर इच्छानुसार भ्रमण करो और मेरे पुत्रोंके अथवा मेरे ही समान होकर रहो
sragvī sukeśaḥ paridhāya cānyathā śuśobha dhanvī kavacī śarī yathā | āruhya yānaṃ paridhāvatāṃ bhavān sutaiḥ samo me bhava vā mayā samaḥ ||
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយថា៖ «ពាក់កម្រងផ្កា មានសក់ស្រស់ស្អាត ទោះស្លៀកពាក់បែបនារីក៏ដោយ គាត់ក៏ភ្លឺរលោងដូចវីរបុរស—កាន់ធ្នូ ពាក់អាវក្រោះ និងព្រួញ។ ឡើងលើរទេះ ឬយានណាមួយ ចូរឲ្យគាត់ដើរលេងតាមចិត្ត; ចូរឲ្យគាត់រស់នៅដូចជាម្នាក់ជាមួយកូនប្រុសរបស់ខ្ញុំ ឬស្មើនឹងខ្ញុំផ្ទាល់»។
वैशम्पायन उवाच