द्रौपदी-शैब्यसंवादः — Draupadī’s Identification and Counsel on Hospitality
रिपूर्णां शिरसि स्थित्वा तथा विक्रम्य चोरसि । आत्मदोषात् परिशभ्रष्ट: कथं वक्ष्यामि तानहम्,मैं पराक्रम करके शत्रुओंके मस्तक तथा छातीपर खड़ा हो गया था; परंतु अब अपने ही दोषसे नीचे गिर गया। ऐसी दशामें उन आदरणीय पुरुषोंसे मैं किस प्रकार वार्तालाप करूँगा?
ខ្ញុំធ្លាប់បង្ហាញវីរភាព ឈរលើក្បាល និងទ្រូងសត្រូវ; ប៉ុន្តែឥឡូវនេះ ខ្ញុំបានធ្លាក់ចុះដោយកំហុសរបស់ខ្លួនឯង។ ក្នុងសភាពដូចនេះ ខ្ញុំនឹងនិយាយជាមួយបុរសដ៏គួរគោរពទាំងនោះយ៉ាងដូចម្តេច?
दुर्योधन उवाच