अध्याय ७५ — दैव-पुरुषकार-समन्वयः
Reconciling Contingency and Human Effort
य एतत् प्राप्य मुच्येत न त॑ पश्यामि पूरुषम् । लोहेके विशाल परिघोंकी भाँति मेरी इन मोटी भुजाओंका मध्यभाग कैसा है, यह देख लीजिये। मैं ऐसे किसी वीर पुरुषको नहीं देखता, जो इनके भीतर आकर फिर जीवित निकल जाय
ya etat prāpya mucyeta na taṁ paśyāmi pūruṣam |
ភីមសេនបានប្រកាសដោយកំហឹងថា៖ «សូមមើលកណ្ដាលដៃទាំងក្រាស់របស់ខ្ញុំ—ដូចរង្វង់ដែកធំៗ។ ខ្ញុំមិនឃើញមានវីរបុរសណាម្នាក់ឡើយ ដែលចូលមកក្នុងការចាប់ក្រសោបរបស់ខ្ញុំ ហើយអាចចេញទៅដោយជីវិតវិញ»។
भीमसेन उवाच