उद्योगपर्व — अध्याय 70: युधिष्ठिरस्य शान्त्युपायविचारः
Yudhiṣṭhira’s Deliberation on Peace-Means
#फ्जआ+ (0) आफ अत+- एकसप्ततितमो< ध्याय: धृतराष्ट्रके द्वारा भावद्गुणगान धृतराष्ट उवाच चक्षुष्मतां वै स्पृहयामि संजय द्रक्ष्यन्ति ये वासुदेव॑ समीपे । विभ्राजमानं वपुषा परेण प्रकाशयन्तं प्रदिशो दिशश्ष॒,धृतराष्ट्र बोले--संजय! जो लोग परम उत्तम श्रीअंगोंसे सुशोभित तथा दिशा- विदिशाओंको प्रकाशित करते हुए वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका निकटसे दर्शन करेंगे, उन सफल नेत्रोंवाले मनुष्योंके सौभाग्यको पानेकी मैं भी अभिलाषा रखता हूँ
dhṛtarāṣṭra uvāca | cakṣuṣmatāṁ vai spṛhayāmi sañjaya drakṣyanti ye vāsudevaṁ samīpe | vibhrājamānaṁ vapuṣā pareṇa prakāśayantaṁ pradiśo diśaś ca ||
ធೃತរाष्ट्रបាននិយាយថា៖ «សញ្ជ័យ! ខ្ញុំប្រាថ្នាចង់បានសំណាងដូចមនុស្សដែលមានភ្នែកជោគជ័យទាំងឡាយ—អ្នកដែលនឹងបានឃើញព្រះវាសុទេវៈពីជិត ដោយទ្រង់ភ្លឺរលោងដោយពន្លឺលើសលប់ បំភ្លឺទិសទាំងបួន និងទិសទាំងអស់»។
धृतराष्ट उवाच