Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
सनत्युजात उवाच एकस्य वेदस्याज्ञानाद् वेदास्ते बहवः कृता: । सत्यस्यैकस्य राजेन्द्र सत्ये कश्चिदवस्थित:,सनत्सुजातने कहा--राजन्! सृष्टिके आदिमें वेद एक ही थे, परंतु न समझनेके कारण (एक ही वेदके) बहुत-से विभाग कर दिये गये हैं। उस सत्यस्वरूप एक वेदके सारतत्त्व परमात्मामें तो कोई बिरला ही स्थित होता है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये त्रिचत्वारिंशो ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें सनत्युजातवाक्यविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
sanatsujāta uvāca | ekasya vedasyājñānād vedāste bahavaḥ kṛtāḥ | satyasyāikasya rājendra satye kaścid avasthitaḥ ||
សនត្សុជាតបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! នៅដើមកំណើត ព្រះវេទមានតែមួយប៉ុណ្ណោះ; ប៉ុន្តែព្រោះមិនយល់ពិត ទើបគេបែងចែកវេទតែមួយនោះជាច្រើន។ ទោះយ៉ាងណា ក្នុងសច្ចៈតែមួយ—សេចក្តីពិតឯង—មានតែអ្នកកម្រណាស់ដែលឈរមាំមួនបាន»។
सनत्युजात उवाच