Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu
Chapter 42
श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत् । तेन दुःखं तरत्येव भिन्न॑ तस्मिन् जितं कृते,मदमें अठारह दोष हैं; ऊपर जो दमके विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मदके दोष बताये गये हैं। त्याग छः: प्रकारका होता है, वह छहों प्रकारका त्याग अत्यन्त उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात् कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दुःखोंको निश्चय ही पार कर जाता है। कामका त्याग कर देनेपर सब कुछ जीत लिया जाता है
śreyāṁs tu ṣaḍvidhas tyāgas tṛtīyo duṣkaro bhavet | tena duḥkhaṁ taraty eva bhinnaṁ tasmin jitaṁ kṛte ||
សនត្សុជាតៈ បានមានព្រះវាចា៖ «ការលះបង់មាន៦ប្រភេទ ហើយជាវិន័យដ៏ប្រសើរបំផុត។ ប៉ុន្តែប្រភេទទី៣ នោះពិបាកអនុវត្តណាស់។ ដោយការលះបង់នោះ មនុស្សប្រាកដជាឆ្លងផុតទុក្ខ; ពេលវាត្រូវបានស្ថិតស្ថេរហើយ គឺដូចជាបានឈ្នះអស់ទាំងអ្វីៗ»។
सनत्युजात उवाच