Udyoga-parva Adhyāya 28: Dharmādharmalakṣaṇa in Āpad
Crisis-Discernment of Right and Wrong
जिन्होंने देवताओंमें श्रेष्ठ स्थान पानेकी इच्छासे तन््द्रारहित होकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किया था, वे महातेजस्वी बलसूदन इन्द्र भी आलस्य छोड़कर (कर्मपरायण होकर ही) मेघगर्जनाद्वारा आकाश तथा दिशाओंको गुँजाते हुए समय-समयपर वर्षा करते हैं ।। हित्वा सुखं मनसश्न प्रियाणि तेन शक्र: कर्मणा श्रैष्ठ्यमाप । सत्यं धर्म पालयन्नप्रमत्तो दमं तितिक्षां समतां प्रियं च,इन्द्रने सुख तथा मनको प्रिय लगनेवाली वस्तुओंका त्याग करके सत्कर्मके बलसे ही देवताओंमें ऊँची स्थिति प्राप्त की। उन्होंने सावधान होकर सत्य, धर्म, इन्द्रियसंयम, सहिष्णुता, समदर्शिता तथा सबको प्रिय लगनेवाले उत्तम बर्तावका पालन किया था। इन समस्त सदगुणोंका सेवन करनेके कारण ही इन्द्रको देवसग्राट्का श्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार बृहस्पतिजीने भी नियमपूर्वक समाहित एवं संयतचित्त होकर सुखका परित्याग करके समस्त इन्द्रियोंकों अपने वशमें रखते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया था। इसी सत्कर्मके प्रभावसे उन्होंने देवगुरुका सम्मानित पद प्राप्त किया है। आकाशके सारे नक्षत्र सत्कर्मके ही प्रभावसे परलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु तथा विश्वदेवगण भी कर्मबलसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए हैं
hitvā sukhaṁ manasaś ca priyāṇi tena śakraḥ karmaṇā śraiṣṭhyam āpa | satyaṁ dharmaṁ pālayann apramatto damaṁ titikṣāṁ samatāṁ priyaṁ ca ||
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वायुदेव उवाच