अध्याय २६ — युद्ध-निन्दा, काम-दोष, तथा धार्तराष्ट्र-नीति-विश्लेषण
War-aversion, Desire as a Policy Fault, and Analysis of Dhṛtarāṣṭra’s Governance
अमात्यानां यदि कामस्य हेतो- रेवं युक्त कर्म चिकीर्षसि त्वम् अफक्रामे: स्वं प्रदायैव तेषां मा गास्त्वं वै देवयानात् पथोडद्य,यदि आप अपने मन्त्रियोंकी इच्छासे ही ऐसा पापमय युद्ध करना चाहते हैं तो अपना सर्वस्व उन मन्त्रियोंको ही देकर वानप्रस्थ ग्रहण कर लीजिये; परंतु अपने कुटुम्बका वध करके देवयानमार्गसे भ्रष्ट न होइये इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि संजयवाक्ये सप्तविंशो5ध्याय: ।। २७ || इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यंजययानपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
sañjaya uvāca | amātyānāṃ yadi kāmasya hetoḥ evaṃ yukta-karma cikīrṣasi tvam | apakrāmeḥ svaṃ pradāyaiva teṣāṃ mā gās tvaṃ vai devayānāt patho 'dya ||
សញ្ជ័យបាននិយាយថា៖ «បើគ្រាន់តែដើម្បីបំពេញបំណងរបស់មន្ត្រីរបស់អ្នក អ្នកចង់ធ្វើសកម្មភាពបែបនេះ—ចូរដកខ្លួនចេញទៅ; ចូរប្រគល់ទ្រព្យសម្បត្តិរបស់អ្នកឲ្យមន្ត្រីទាំងនោះ ហើយចូលនិវត្តន៍។ តែកុំសម្លាប់ញាតិវង្សរបស់ខ្លួន ហើយធ្លាក់ចេញនៅថ្ងៃនេះពីផ្លូវដែលនាំទៅកាន់ទេវលោក។»
संजय उवाच