Indra-vijaya Upākhyāna and Śalya’s Assurance to Yudhiṣṭhira (इन्द्रविजयोपाख्यानम् — शल्ययुधिष्ठिरसंवादः)
न चारिजं भयं तस्य नापुत्रो वा भवेन्नर: । नापदं प्राप्तुयात् कांचिद् दीर्घमायुश्न विन्दति । सर्वत्र जयमाप्नोति न कदाचित् पराजयम्,वह मनुष्य कभी संतानहीन नहीं होता, उसे शत्रुजनित भय नहीं सताता, उसपर कोई आपत्ति नहीं आती, वह दीर्घायु होता है, उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है तथा कभी उसकी पराजय नहीं होती है
na cārijaṁ bhayaṁ tasya nāputro vā bhaven naraḥ | nāpadaṁ prāptuyāt kāñcid dīrgham āyuṣyaṁ vindati | sarvatra jayam āpnoti na kadācit parājayam ||
មនុស្សនោះមិនក្លាយជាអ្នកគ្មានកូនឡើយ; ភ័យដែលកើតពីសត្រូវមិនរំខានគាត់; គ្រោះអាសន្នណាមួយក៏មិនធ្លាក់លើគាត់; គាត់បានអាយុវែង; គាត់ទទួលបានជ័យជម្នះគ្រប់ទីកន្លែង ហើយមិនដែលជួបបរាជ័យឡើយ។
शल्य उवाच