Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
नाहमेतत् करिष्यामि गच्छथ्वं वै सुरोत्तमा: । असिमिंश्षार्थे पुरा गीत॑ ब्रह्मणा श्रूयतामिदम्,विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठटण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये
nāham etat kariṣyāmi gacchathvaṃ vai surottamāḥ | asminn arthe purā gītaṃ brahmaṇā śrūyatām idam, viśeṣataḥ |
សាល្យៈ បាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំនឹងមិនធ្វើរឿងនេះទេ។ ឱ ព្រះទេវដ៏ប្រសើរបំផុត អ្នកទាំងឡាយចូរចាកចេញទៅ។ ក្នុងរឿងនេះ កាលបុរាណ ព្រះព្រហ្មា បានច្រៀងបទបង្រៀនមួយ—ចូរស្តាប់វាឥឡូវនេះ ដោយពិសេស។»
शल्य उवाच