Udyoga Parva, Adhyaya 104: Nārada on Suhṛt and Nirbandha; the Viśvāmitra–Gālava Exemplum Begins
गरुत्मन् मन्यसे55त्मानं बलवन्तं सुदुर्बलम् । अलमस्मत्समक्षं ते स्तोतुमात्मानमण्डज,कण्व मुनि कहते हैं--राजन्! गरुड़की ये बातें भयंकर परिणाम उपस्थित करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर रथांगपाणि श्रीविष्णुने किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले पश्षिराजको क्षुब्ध करते हुए कहा--“गरुत्मन्! तुम हो तो अत्यन्त दुर्बल, परंतु अपने-आपको बड़ा भारी बलवान् मानते हो। अण्डज! मेरे सामने फिर कभी अपनी प्रशंसा न करना
garutmān manyase ’tmānaṁ balavantaṁ sudurbalam | alam asmat-samakṣaṁ te stotum ātmānam aṇḍaja ||
កណ្ណវៈបាននិយាយថា៖ «ឱ គរុត្មាន! អ្នកពិតជាខ្សោយណាស់ តែអ្នកគិតថាខ្លួនឯងខ្លាំងលើសគេ។ ឱកូនកើតពីស៊ុត! គ្រប់គ្រាន់ហើយ—កុំសរសើរខ្លួនឯងនៅចំពោះមុខខ្ញុំទៀតឡើយ»។
कण्व उवाच