अव्यक्त-प्रबोधः (Awakening to the Unmanifest): The 25th and 26th Principles and Eligibility for Brahma-vidyā
वैदेह कं शूद्रमुदाहरन्ति द्विजा महाराज श्रुतोपपन्ना: । अहं हि पश्यामि नरेन्द्र देवं विश्वस्य विष्णुं जगत: प्रधानम्,महाराज विदेहनरेश! वेद-शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न द्विज शूद्रको प्रजापतिके तुल्य बताते हैं (क्योंकि वह परिचर्यद्वारा समस्त प्रजाका पालन करता है); परंतु नरेन्द्र! मैं तो उसे सम्पूर्ण जगतके प्रधान रक्षक भगवान् विष्णुके रूपमें देखता हूँ (क्योंकि पालन कर्म विष्णुका ही है और वह अपने उस कर्मद्वारा पालनकर्ता श्रीहरिकी आराधना करके उन्हींको प्राप्त होता है)
vaideha kaṁ śūdram udāharanti dvijā mahārāja śrutopapannāḥ | ahaṁ hi paśyāmi narendra devaṁ viśvasya viṣṇuṁ jagataḥ pradhānam ||
បារាសរៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រនៃវិទេហៈ! ទ្វិជដែលមានចំណេះដឹងវេដៈ និងឈរលើអំណាចនៃសាស្ត្រពិសិដ្ឋ ពោលថា សូទ្រ ស្មើនឹងប្រជាបតិ ព្រោះដោយសេវាកម្ម គាត់គាំទ្រ និងថែរក្សាសហគមន៍ទាំងមូល។ ប៉ុន្តែ ឱ អធិរាជនៃមនុស្ស! ខ្ញុំវិញឃើញគាត់ជាវិស្ណុរបស់សកលលោក—ជាអ្នកអភិរក្សដ៏ប្រសើរបំផុតនៃពិភពលោក—ព្រោះកិច្ចការការពារ និងការថែរក្សា ជាកិច្ចរបស់វិស្ណុផ្ទាល់; ដោយបំពេញកាតព្វកិច្ចថែរក្សានោះ គាត់បូជាព្រះហរិតាមរយៈសកម្មភាព ហើយឈានដល់ព្រះអង្គ»។
पराशर उवाच