कपिल–स्यूमरश्मि संवादः
Kapila and Syūmaraśmi on Renunciation, Householder Support, and Epistemic Authority
समौ तावपि मे स्यातां न हि मे<स्ति प्रियाप्रियम् । एतदीदृशकं धर्म प्रशंसन्ति मनीषिण:,इस कर्मका हेतु या परिणाम क्या है? इसपर विचार करके ही तुम्हें किसी भी धर्मको स्वीकार करना चाहिये। लोगोंने किया है या कर रहे हैं, यह जानकर उनका अन्धानुकरण नहीं करना चाहिये। जाजले! अब मैं अपने विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ, उसे सुनो, जो मुझे मारता है तथा जो मेरी प्रशंसा करता है, वे दोनों ही मेरे लिये बराबर हैं। उनमेंसे कोई भी मेरे लिये प्रिय या अप्रिय नहीं है, मनीषी पुरुष ऐसे ही धर्मकी प्रशंसा करते हैं
samau tāv api me syātāṃ na hi me 'sti priyāpriyam | etad īdṛśakaṃ dharmaṃ praśaṃsanti manīṣiṇaḥ ||
ពួកគេទាំងពីរនោះ សម្រាប់ខ្ញុំស្មើគ្នា ព្រោះខ្ញុំមិនមានអ្វីដែលខ្ញុំចាត់ទុកថាជាទីស្រឡាញ់ ឬជាទីស្អប់ឡើយ។ មនុស្សប្រាជ្ញាសរសើរធម៌បែបនេះ។
तुलाधार उवाच