Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
अस्पृह: सर्वकामेभ्यो ब्रह्म॒चर्यदृढव्रत: । अहिंख: सर्वभूतानामीदृक् सांख्यो विमुच्यते,जो किसी वस्तुकी न तो इच्छा करता है, न अनिच्छा ही करता है, जीवन- निर्वाहमात्रके लिये जो कुछ मिल जाता है, उसीपर संतोष करता है, जो निर्लोभ, व्यथारहित और जितेन्द्रिय है, जिसको न तो कुछ करनेसे प्रयोजन है और न कुछ न करनेसे ही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन कभी चंचल नहीं होते, जिसका मनोरथ पूर्ण हो गया है, जो समस्त प्राणियोंपर समान दृष्टि और मैत्रीभाव रखता है, मिट्टीके ढेले, पत्थर और स्वर्णको एक-सा समझता है, जिसकी दृष्टिमें प्रिय और अप्रियका भेद नहीं है, जो धीर है और अपनी निन्दा तथा स्तुतिमें सम रहता है, जो सम्पूर्ण भोगोंमें स्पृहारहित है, जो दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित है तथा जो सब प्राणियोंमें हिंसाभावसे रहित है, ऐसा सांख्ययोगी (ज्ञानी) संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है
aspṛhaḥ sarvakāmebhyo brahmacaryadṛḍhavrataḥ | ahiṃsakaḥ sarvabhūtānām īdṛk sāṅkhyo vimucyate ||
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व्यास उवाच