तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिर: । आशिषोथ्युद्धक्त स ततः प्रायात् कर्णरथं प्रति,प्रयाहि शीघ्र॑ गोविन्द सूतपुत्रजिघांसया । “गोविन्द! अब मेरा रथ तैयार हो। उसमें पुनः उत्तम घोड़े जोते जायँ और मेरे उस विशाल रथमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र सजाकर रख दिये जायाँ। अअभ्वारोहियोंद्वारा सिखलाये और टहलाये गये घोड़े रथसम्बन्धी उपकरणोंसे सुसज्जित हो शीघ्र यहाँ आवें और आप सूतपुत्रके वधकी इच्छासे जल्दी ही यहाँसे प्रस्थान कीजिये” उस समय महाबुद्धिमान् धर्मराज राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको आशीर्वाद दिये। तत्पश्चात् उन्होंने कर्णके रथकी ओर प्रस्थान किया
sañjaya uvāca |
tasya rājā mahāprājño dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ |
āśiṣo 'tha yuddhaktas tataḥ prāyāt karṇarathaṃ prati |
prayāhi śīghraṃ govinda sūtaputrajighāṃsayā |
សញ្ជ័យបាននិយាយ៖ នៅពេលនោះ ព្រះរាជា យុធិષ્ઠិរ ធម៌រាជ អ្នកមានប្រាជ្ញាធំ បានប្រទានពរ និងអភ័យពរដល់អర్జុន។ បន្ទាប់មក គាត់បានចេញដំណើរទៅរករទេះរបស់កರ್ಣ។ ហើយគាត់បានជំរុញ Govinda ឲ្យទៅឆាប់ៗ ដោយបំណងដាច់ខាតដើម្បីបំផ្លាញកូនសូតា (កರ್ಣ) និងឲ្យប្រញាប់ទៅសម្រាប់គោលបំណងនោះ។
संजय उवाच