कर्णनिधनवृत्तान्तनिवेदनम् | Reporting Karṇa’s Fall to Yudhiṣṭhira
जो लोग अन्यायपूर्वक दूसरोंके धन आदिका अपहरण कर लेना चाहते हैं, वे कभी अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये दूसरोंसे सत्यभाषणरूप धर्मका पालन कराना चाहते हों तो वहाँ उनके समक्ष मौन रहकर उनसे पिण्ड छुड़ानेकी चेष्टा करे, किसी तरह कुछ बोले ही नहीं ।। अवश्यं कूजितव्ये वा शड्केरन्नप्पकूजत: । श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं तत् सत्यमविचारितम्,किंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय अथवा न बोलनेसे लुटेरोंको संदेह होने लगे तो वहाँ असत्य बोलना ही ठीक है। ऐसे अवसरपर उस असत्यको ही बिना विचारे सत्य समझो
avaśyaṃ kūjitabye vā śaṅkerann appakūjataḥ | śreyas tatrānṛtaṃ vaktuṃ tat satyam avicāritam ||
វាយុទេវបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ បើត្រូវបង្ខំឲ្យនិយាយ ឬបើស្ងៀមស្ងាត់នឹងធ្វើឲ្យពួកចោរមានសង្ស័យ នោះក្នុងស្ថានការណ៍នោះ ការនិយាយមិនពិតវិញល្អជាង។ នៅពេលអាសន្នដូចនេះ មិនត្រូវគិតពិចារណាច្រើនទេ តែត្រូវទទួលយកពាក្យមិនពិតនោះជាពាក្យ «ពិត» ដែលគួរនិយាយ ព្រោះវាបម្រើគោលដៅខ្ពស់ជាងគេ គឺគេចផុតពីគ្រោះថ្នាក់ និងការពារខ្លួនពីអ្នកឈ្លានពានដោយអយុត្តិធម៌។
वायुदेव उवाच