Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
अन््यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते । तब लोकनाथ भगवान् ब्रह्माने उनसे कहा--“असुरो! सबके लिये अमरत्व सम्भव नहीं है। तुम इस तपस्यासे निवृत्त हो जाओ और दूसरा कोई वर जैसा तुम्हें रुचे माँग लो” ।। ९३ || ततस्ते सहिता राजन् सम्प्रधार्यासकृत् प्रथम्,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे
tatas te sahitā rājan sampradhāryāsakṛt pratham | nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā || tapam ugraṃ samāsthāya niyame parame sthitāḥ |
Duryodhana said: “O king of Madra, having first reflected on this matter again and again, listen to it with a steady mind; you should not entertain doubt about it. In former times, when the gods had defeated the Daityas, the three sons of Tārakāsura—Tārakākṣa, Kamalākṣa, and Vidyunmālī—undertook fierce austerities and remained established in the highest disciplines.”
दुर्योधन उवाच