Daivī–Āsurī Sampad-Vibhāga (दैवी–आसुरी संपद्विभागः) | Division of Constructive and Destructive Dispositions
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:* । ते प्राप्तुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:,परंतु जो पुरुष इन्द्रियोंक समुदायको भली प्रकार वशमें करके मन-बुद्धिसे परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे (अभिन्नभावसे) ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत* और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं?
saṁniyamyendriyagrāmaṁ sarvatra samabuddhayaḥ | te prāpnuvanti mām eva sarvabhūtahite ratāḥ ||
«អ្នកដែលគ្រប់គ្រងក្រុមអង្គសញ្ញាទាំងមូល យកចិត្តស្មើគ្នាចំពោះគ្រប់ទី និងរីករាយក្នុងសុខមង្គលរបស់សត្វទាំងពួង—យោគីទាំងនោះមកដល់ខ្ញុំតែប៉ុណ្ណោះ»។
अजुन उवाच