Daivī–Āsurī Sampad-Vibhāga (दैवी–आसुरी संपद्विभागः) | Division of Constructive and Destructive Dispositions
इस प्रकार महाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगगवद््गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद््गीतोपनिषद्: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अथैतदप्यशक्तोडसि कर्तु मद्योगमाश्रित: । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्* यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त साधनको करनेमें भी तू असमर्थ है तो मन-बुद्धि आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोंके फलका त्याग करे
atha etad apy aśakto 'si kartuṁ mad-yogam āśritaḥ | sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān ||
បើទោះជាអ្នកពឹងផ្អែកលើយោគដែលនាំទៅរកខ្ញុំ ហើយនៅតែមិនអាចអនុវត្តវិធីសាស្ត្រខាងលើបានទេ នោះ—ដោយបានឈ្នះលើខ្លួនឯង—ចូរលះបង់ផលនៃកិច្ចការទាំងអស់។
अजुन उवाच