Puruṣottama-yoga
The Discipline of the Supreme Person) — Chapter 15 (Bhagavadgītā
सम्बन्ध-- अजुनने तीसरे और चौथे शलोकोमें भगवानूसे अपने ऐश्वर्यमय रूपका दर्शन करानेके लिये प्रार्थना की थी, उसीके अनुसार भरगवान्ने अपना विश्वरूप अर्जुनको दिखलाया; परंतु भगवान्के इस भयानक उग्ररूपको देखकर अर्जुन बहुत डर गये और उनके मनमें इस बातके जाननेकी इच्छा उत्पन्न हो गयी कि ये श्रीकृष्ण वस्चुतः कौन हैं तथा इस महान् उग्र स्वरूपके द्वारा अब ये क्या करना चाहते हैं। इसीलिये वे भगवान्से पूछ रहे हैं-- आखेयाहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्,मुझे बतलाइये कि आप उग्ररूपवाले कौन हैं? हे देवोंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। आदिपुरुष आपको मैं विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानताई
arjuna uvāca | ākhyāhi me ko bhavān ugrarūpo namo'stu te devavara prasīda | vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṁ na hi prajānāmi tava pravṛttim ||
អర్జុនបាននិយាយថា៖ «សូមប្រាប់ខ្ញុំ—ព្រះអង្គជានរណា ក្នុងរូបដ៏គួរភ័យខ្លាចនេះ? ឱ ព្រះដ៏ប្រសើរជាងទេវទាំងឡាយ! ខ្ញុំសូមក្រាបបង្គំ។ សូមព្រះអង្គមេត្តាប្រោស។ ខ្ញុំប្រាថ្នាចង់ស្គាល់ព្រះអង្គឲ្យច្បាស់ថាជាបុរសដើម (អាទិ) ព្រោះខ្ញុំមិនយល់ពីគោលបំណង និងដំណើរនៃការប្រព្រឹត្តរបស់ព្រះអង្គទេ»។
अजुन उवाच