Viśvarūpa-darśana (The Vision of the Universal Form) — महायोगेश्वरस्य विश्वरूपदर्शनम्
फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। इसलिये तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्यशरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन करः |। सम्बन्ध-- पिछले शलोकमें भगवान्ने अपने भजनका गयहत्त्व दिखलाया और अन्तमें अजुनको भजन करनेके लिये कहा। अतएव अब भगवान् अपने भ्रजनका अर्थात् शरणागतिका प्रकार बतलाते हुए अध्यायकी समाप्ति करते हैं-- मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां: नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:,मुझमें मनवाला हो,” मेरा भक्त बन,* मेरा पूजन करनेवाला हो,“ मुझको प्रणाम करेे। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करकेः मेरे परायण* होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा?
manmanā bhava madbhakto madyājī māṁ namaskuru | mām evaiṣyasi yuktvaivam ātmānaṁ matparāyaṇaḥ ||
តើនៅត្រូវនិយាយអ្វីទៀត? ព្រោះសូម្បីតែព្រះព្រាហ្មណ៍មានសីលធម៌ និងព្រះរាជឥសីដែលជាអ្នកភក្តិ—ពេលបានចូលមកសុំជ្រកកោនក្នុងខ្ញុំ—ក៏ឈានដល់គោលដៅដ៏លើសលប់។ ដូច្នេះ អ្នកបានទទួលរាងកាយមនុស្សដែលគ្មានសុខពិត និងរលាយបាត់ក្នុងមួយភ្លែតហើយ—ចូរធ្វើភជនៈចំពោះខ្ញុំជានិច្ច។ «ចូរឲ្យចិត្តស្ថិតនៅក្នុងខ្ញុំ; ចូរជាភក្តិរបស់ខ្ញុំ; ចូរធ្វើបូជាចំពោះខ្ញុំ; ចូរគោរពបង្គំខ្ញុំ។ ដោយបង្រៀនខ្លួនឯងឲ្យភ្ជាប់អាត្មា (ចិត្ត) ទៅក្នុងខ្ញុំ និងយកខ្ញុំជាជម្រក និងគោលដៅខ្ពស់បំផុត—អ្នកនឹងមកដល់ខ្ញុំតែមួយគត់។»
अजुन उवाच