कर्मयोग–ज्ञानयज्ञ–अवतारोपदेश
Karma-Yoga, Jñāna-Yajña, and Avatāra Instruction
सम्बन्ध-- इस प्रकार कर्मयोगका महत्त्व बतलाकर अब उसके आचरणकी विधि बतलानेके लिये पहले उस कर्मयोगरें परम आवश्यक जो सिद्ध कर्मयोगीकी निश्चयात्मिका स्थायी समबुद्धि है. उसका और कर्मयोगरमें बाधक जो सकाम मनुष्योंकी भिन्न-भिन्न बुद्धियाँ हैं; उनका भेद बतलाते हैं-- व्यवसायात्तमिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा हानन्ताश्च बुद्धयो5व्यवसायिनाम्,हे अर्जुन! इस कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किंतु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं
vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana | bahu-śākhā hy anantāś ca buddhayo ’vyavasāyinām ||
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संजय उवाच