Śakuntalā’s Satya-Discourse and the Recognition of Bharata (शकुन्तला–सत्योपदेशः; भरतप्रतिग्रहः)
लोड्यमानं महारण्यं तत्यजु: सम मृगाधिपा: । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
loḍyamānaṃ mahāraṇyaṃ tatyajuḥ sama-mṛgādhipāḥ | tatra vidruta-yūthāni hata-yūthapatīni ca ||
វៃសម្បាយណៈបាននិយាយ៖ ពេលព្រៃធំត្រូវបានកក្រើក និងស្ទង់ស្វែងយ៉ាងសាហាវ អធិរាជសត្វ—សិង្ហ និងខ្លា—បានបោះបង់វា ហើយរត់គេច។ នៅទីនោះ ហ្វូងសត្វជាច្រើនរត់ភ័យស្លន់ស្លោ ដោយមេហ្វូងត្រូវសម្លាប់; ហ្វូងផ្សេងទៀតបែកខ្ចាត់ខ្ចាយ ទុក្ខព្រួយ ហើយស្រែកអាណោចអាធ័មពេលរត់គេច។ វាបង្ហាញថា កម្លាំងសង្គ្រាមដែលគ្មានការគ្រប់គ្រង ពេលបង្វែរទៅលើធម្មជាតិ នាំមកនូវភ័យ ការរំខាន និងទុក្ខវេទនាចំពោះអ្នកគ្មានទោស—ជាការព្រមានដោយសីលធម៌អំពីអន្តរាយរួមនៃអំណាចដែលគ្មានការទប់ស្កាត់។
वैशम्पायन उवाच