Ādi Parva, Adhyāya 47 — Janamejaya’s Sarpa-satra: Vow, Preparation, and the Onset of the Serpent Offering
अह्वः परिक्षये ब्रह्मूंस्तत: साचिन्तयत् तदा । वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी,ब्रह्म! दिन समाप्त होने ही वाला था। अतः वासुकिकी मनस्विनी बहिन जरत्कारु अपने पतिके धर्मलोपसे भयभीत हो उस समय इस प्रकार सोचने लगी--“इस समय पतिको जगाना मेरे लिये अच्छा (धर्मानुकूल) होगा या नहीं? मेरे धर्मात्मा पतिका स्वभाव बड़ा दुःखद है। मैं कैसा बर्ताव करूँ, जिससे उनकी दृष्टिमें अपराधिनी न बनूँ
Ahnāḥ parikṣaye brāhmāṁs tataḥ sā cintayat tadā | Vāsuker bhaginī bhītā dharmalopān manasvinī ||
ពេលថ្ងៃជិតផុត នាងក៏គិតពិចារណា។ ប្អូនស្រីរបស់វាសុកិ—មានចិត្តខ្ពង់ខ្ពស់ តែភ័យថាកិច្ចធម៌របស់ប្តីនឹងខាន—បានចាប់ផ្តើមស្ទាក់ស្ទើរ៖ «ឥឡូវនេះ តើគួរឲ្យខ្ញុំដាស់ប្តីឬមិនគួរ? ប្តីខ្ញុំជាអ្នកធម៌ ប៉ុន្តែអាកប្បកិរិយារឹងមាំ និងងាយសោកសៅ; ខ្ញុំគួរធ្វើដូចម្តេច ដើម្បីកុំឲ្យទ្រង់ឃើញខ្ញុំជាមនុស្សមានកំហុស?»
तक्षक उवाच