आदि पर्व — अध्याय 148: कुन्ती–ब्राह्मणसंवादः (दुःखमूल-प्रश्नः) / Kuntī and the Brahmin: Inquiry into the Root of Suffering
तदुपादीपयद् भीम: शेते यत्र पुरोचन: । ततो जतुगृहद्वारं दीपयामास पाण्डव:,परंतु दैवेच्छासे उस भोजके समय एक भीलनी अपने पाँच बेटोंके साथ वहाँ भोजनकी इच्छासे आयी, मानो कालने ही उसे प्रेरित करके वहाँ भेजा था। वह भीलनी मदिरा पीकर मतवाली हो चुकी थी। उसके पुत्र भी शराब पीकर मस्त थे। राजन! शराबके नशेमें बेहोश होनेके कारण अपने सब पुत्रोंके साथ वह उसी घरमें सो गयी। उस समय वह अपनी सुध- बुध खोकर मृतक-सी हो रही थी। रातमें जब सब लोग सो गये, उस समय सहसा बड़े जोरकी आँधी चली। तब भीमसेनने उस जगह आग लगा दी, जहाँ पुरोचन सो रहा था। फिर उन्होंने लाक्षागृहके प्रमुख द्वारपर आग लगायी
tadupādīpayad bhīmaḥ śete yatra purocanaḥ | tato jatugṛhadvāraṃ dīpayāmāsa pāṇḍavaḥ ||
វៃសម្បាយនៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ បន្ទាប់មក ប៊ីមៈបានដុតកន្លែងដែលពុរោចនៈដេកលក់។ បន្ទាប់ពីនោះ បណ្ឌវៈក៏បានដុតទ្វារធំរបស់ផ្ទះលាក់។ ក្នុងស៊ុមធម៌នៃវគ្គនេះ ការធ្វើនោះត្រូវបានបង្ហាញថាជាយុទ្ធសាស្ត្ររត់គេចពីគ្រោងសម្លាប់ ដែលធ្វើឡើងនៅពេលយប់ ពេលភ្នាក់ងារសត្រូវងាយរងគ្រោះ ដើម្បីធានាការរស់រានរបស់បណ្ឌវៈប្រឆាំងនឹងការក្បត់ដែលជំរុញដោយអធម៌។
वैशम्पायन उवाच