आदि पर्व (अध्याय १२७) — रङ्गे कर्णस्य अवमानः, दुर्योधनस्य प्रतिपक्ष-निवृत्तिः, मैत्री-स्थापनम् / Ādi Parva (Chapter 127) — Karṇa’s Public Humiliation, Duryodhana’s Intervention, and the Formation of Alliance
ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् । शुचिकालीयकादिग्ध॑ दिव्यचन्दनरूषितम्,तदनन्तर राजा पाण्डुकी अस्थियोंको सब प्रकारकी सुगन्धोंसे सुवासित करके उनपर पवित्र काले अगरका लेप किया गया। फिर उन्हें दिव्य चन्दनसे चर्चित करके सोनेके कलशोंद्वारा लाये हुए गंगाजलसे भाई-बन्धुओंने उसका अभिषेक किया। तत्पश्चात् उनपर सब ओरसे काले अगरसे मिश्रित तुंगरस नामक ग्रन्ध-द्रव्यका एवं श्वेत चन्दनका लेप किया गया। इसके बाद उन्हें सफेद स्वदेशी वस्त्रोंसे ढक दिया गया
tatas tasya śarīraṃ tu sarvagandhādhivāsitam | śucikālīyakādigdhaṃ divyacandanarūṣitam ||
វៃសម្បាយណៈបានមានពាក្យថា៖ បន្ទាប់មក ព្រះសពរបស់ទ្រង់ត្រូវបានបំព្រងដោយក្លិនក្រអូបទាំងឡាយ—លាបដោយអាការ (aguru) ពណ៌ខ្មៅដ៏បរិសុទ្ធ និងលាបបន្ថែមដោយចន្ទន៍ទិព្វ។ ដោយគោរពតាមធម៌ និងកាតព្វកិច្ចសាច់ញាតិ ពួកគេបានអនុវត្តពិធីគោរពអ្នកស្លាប់ ដោយប្រើគ្រឿងក្រអូប និងការស្រោចទឹកពិធី ដើម្បីថែរក្សាសេចក្តីបរិសុទ្ធ និងកិត្តិយស។
वैशम्पायन उवाच