नियोगप्रसङ्गः — The Niyoga Episode: Births of Dhṛtarāṣṭra, Pāṇḍu, and Vidura
शप्ता: सम इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमु: । प्रसादयन्तस्तमृषिं वसव: पार्थिवर्षभ,उन्हें शाप देकर उन महाभाग महर्षिने फिर तपस्यामें ही मन लगाया। राजन! तपस्याके धनी ब्रह्मर्षि वसिष्ठका प्रभाव बहुत बड़ा है। इसीलिये उन्होंने क्रोधमें भरकर देवता होनेपर भी उन आठों वसुओंको शाप दे दिया। तदनन्तर हमें शाप मिला है, यह जानकर वे वसु पुनः महामना वसिष्ठके आश्रमपर आये और उन महर्षिको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे। नृपश्रेष्ठी महर्षि आपव समस्त धर्मोके ज्ञानमें निपुण थे। महाराज! उनको प्रसन्न करनेकी पूरी चेष्टा करने-पर भी वे वसु उन मुनिश्रेष्ठसे उनका कृपाप्रसाद न पा सके
śaptāḥ sma iti jānanta ṛṣiṁ tam upacakramuḥ | prasādayantas tam ṛṣiṁ vasavaḥ pārthivarṣabha ||
ដោយដឹងថា «យើងត្រូវបានដាក់បណ្តាសា» វសុទាំងឡាយបានចូលទៅជិតឥសីនោះម្តងទៀត ព្រះអង្គជាគោឧសភក្នុងចំណោមស្តេច។ ដើម្បីបន្ធូរព្រះហឫទ័យរបស់គាត់ ពួកវសុបានខិតខំសុំអនុគ្រោះពីរីសី; ប៉ុន្តែទោះបីព្យាយាមយ៉ាងណាក៏ដោយ ពួកគេមិនអាចទទួលបានការលើកលែងដោយមេត្តាបានឡើយ—បង្ហាញថា សូម្បីតែទេវតាក៏ត្រូវគោរពចំពោះអំណាចសីលធម៌នៃតបស្យារបស់ព្រហ្មឥសី និងផលវិបាកនៃអំពើខុស។
वैशम्पायन उवाच