अध्याय ५८ — वानरध्वजस्य महेन्द्रास्त्रप्रयोगः
Chapter 58: Arjuna’s Deployment of the Indra-Weapon
तथैव दिव्यं गाण्डीवं धनुरादाय पाण्डव: । शत्रुघ्नं वेगवान् हृष्टो भारसाधनमुत्तमम्,इसी प्रकार हर्षमें भरे हुए वेगशाली पाण्डुनन्दन अर्जुन भी भार सहन करनेमें समर्थ और शत्रुओंका नाश करनेवाला उत्तम एवं दिव्य गाण्डीव धनुष लेकर बहुतसे स्वर्णभूषित विचित्र बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। पराक्रमी पार्थ अपने धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहोंद्वारा तुरंत ही आचार्य द्रोणकी बाण-वर्षाको नष्ट करते जाते थे। यह एक अद्भुत-सी बात थी
tathaiva divyaṃ gāṇḍīvaṃ dhanur ādāya pāṇḍavaḥ | śatrughnaṃ vegavān hṛṣṭo bhārasādhanam uttamam ||
そのとき同じく、俊敏で歓喜に満ちたパーンダヴァ(アルジュナ)は、神なる弓ガーンディーヴァを手に取った――それは強大な張力に耐え、敵を滅ぼす最上の武器である。彼は黄金で飾られた華麗で多彩な矢を雨のごとく降らせ、己の弓から放たれる矢の斉射によって、ドローナの放つ矢の雨をたちまち抑え、打ち砕いていった。その光景は驚嘆すべきもので、怒りの奔流ではなく、規律ある武勇が敵の敗北へと向けられていることを示していた。
वैशम्पायन उवाच