कृप-अर्जुन रथयुद्धम्
Kṛpa–Arjuna Chariot Engagement
कुन्तीके पुत्र लोभी नहीं हैं। उन्होंने तपस्या आदि कठिन कर्म किये हैं। वे अधर्म या अनुचित उपायसे (धर्मको गँवाकर) केवल राज्य लेनेके इच्छुक नहीं हैं ।। तदैव ते हि विक्रान्तुमीषु: कौरवनन्दना: । धर्मपाशनिबद्धास्तु न चेलु: क्षत्रियव्रतात्,कुरुकुलको आनन्द देनेवाले पाण्डव उसी समय पराक्रम करनेमें समर्थ थे, किंतु वे धर्मके बन्धनमें बँधे थे; इसलिये क्षत्रियव्रतसे विचलित नहीं हुए। यदि कोई अर्जुनको असत्यवादी कहेगा तो वह पराजयको प्राप्त होगा। कुन्तीके पुत्र मौतको गले लगा सकते हैं, किंतु किसी प्रकार असत्यका आश्रय नहीं ले सकते
tadaiva te hi vikrāntum īṣuḥ kauravanandanāḥ | dharmapāśanibaddhās tu na celuḥ kṣatriyavratāt ||
ビーシュマは言った。「まさにその時、クル族を喜ばせるパーンダヴァたちは、全き武勇を示す力を備えていた。だがダルマの枷に縛られ、彼らは武人の誓戒から一歩も逸れなかった。正しさを捨てて王国を貪る欲に駆られたのではない。彼らは死を抱くことはあっても、虚偽や不義の手段に身を寄せることはない。」
भीष्म उवाच