Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)
समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च । संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं॑ भवेत्,कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे। यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे)
なすべきこととなすべからざることを定めるあらゆる場において、益があり、しかも耳に快い言葉を述べよ。もし両方がかなわぬなら、快い言葉を捨ててでも益あることを語れ—益に背く甘言を決して口にしてはならぬ。
धौग्य उवाच