बृहन्नडाप्रवेशः — Bṛhannadā’s Entry into Virāṭa’s Assembly
वस्तुं त्वयीच्छामि विशां वरिष्ठ तान् राजसिंहान् न हि वेझि पार्थान् न शकक््यते जीवितुमप्यकर्मणा न च त्वदन्यो मम रोचते नृप:,शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा विराटके निकट पहुँचकर सहदेव मेघोंकी घनघोर घटाके समान गम्भीर स्वरमें बोले--“महाराज! मैं वैश्य हूँ। मेरा नाम अरिष्टनेमि है। नृपश्रेष्ठ! मैं कुरुवंशशिरोमणि पाण्डवोंके यहाँ गौओंकी गणना तथा देखभाल करता रहा हूँ। अब आपके यहाँ रहना चाहता हूँ; क्योंकि राजाओंमें सिंहके समान पाण्डव कहाँ हैं? यह मैं नहीं जानता। बिना काम किये जीविका चल नहीं सकती और आपके सिवा दूसरा कोई राजा मुझे पसंद नहीं है”
vaiśampāyana uvāca |
vastuṁ tvayīcchāmi viśāṁ variṣṭha tān rājasimhān na hi vedi pārthān |
na śakyate jīvitum apy akarmaṇā na ca tvadanyo mama rocate nṛpaḥ ||
「民の中の最勝よ、我は王のもとに住まわりたい。獅子のごとき王たるパールタたちが、いずこにあるか我は知らぬ。働かずして生きることはできず、諸王のうち王以外に我が心を喜ばす者はない。」
वैशम्पायन उवाच