Tīrtha-yātrā: Prayāga-saṅgama and Gayaśiras—Rājarṣi Gaya’s Mahāyajña
मनो हादुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप । मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि द्रक्ष्यथ,नरेश्वर! यदि मन राग-द्वेषसे दूषित न हो तो वह शुद्धिके लिये पर्याप्त माना गया है। सब प्राणियोंके प्रति मैत्री-बुद्धिका आश्रय ले शुद्धभावसे तीर्थोंका दर्शन करो
人々の王よ。もし心が貪欲と憎悪に汚されぬなら、その心こそ清浄のために十分であるとされる。あらゆる生きとし生けるものへの友愛の知を拠り所として、清らかな思いでティールタ(聖地)を巡礼せよ。
वैशम्पायन उवाच