Kāmyake Arjuna-viyogaḥ — The Pandavas’ despondency in Kāmyaka during Arjuna’s absence
भयात् त्रस्यसि यच्च त्वमाह्नयिष्यति मां पुनः । अक्षज्ञ इति तत् ते5हं नाशयिष्यामि पार्थिव,राजन! तुम जो इस भयसे डर रहे हो कि कोई द्यूतविद्याका ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जूएके लिये बुलायेगा (उस दशामें पुनः पराजयका कष्ट देखना पड़ेगा)। तुम्हारे उस भयको मैं दूर कर दूँगा
「王よ、そなたは恐れている。『賭博の術に通じた者が、再び我を賽の遊びへ呼び戻すのではないか。そうなれば、また敗北の苦しみを見ることになる』と。その恐れを、我がそなたから取り除こう。」
बृहदश्च उवाच