दमयन्तीवाक्य-प्रेषणम्
Damayantī’s Message and the Dispatch of Brahmin Envoys
वसत्यनर्हस्तद् दुःखं भूय एवानुसंस्मरन् । “रातमें उसीका स्मरण करके वह एक श्लोकको गाया करता है। सारी पृथ्वीका चक्कर लगाकर वह कभी किसी स्थानमें पहुँचा और वहीं निरन्तर उस प्रियतमाका स्मरण करके दुःख भोगता रहता है। यद्यपि वह उस दुःखको भोगनेके योग्य है नहीं
彼は本来ふさわしからぬ境遇に身を置き、その苦しみをいよいよ繰り返し思い起こした。「夜ごと彼は彼女を偲び、一つの偈(シュローカ)を歌う。大地を巡ってさすらい、ある場所に辿り着けば、そこでなお愛しき人を絶えず思い、悲嘆を味わい続ける—本来その苦しみを受けるに値しないのに。」
बृहृदश्च उवाच