अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
आत्मार्थ युध्यमानानां विदिते कृत्यलक्षणे | अन्यैरपि हूते राज्ये प्रशंसैव न गर्हणा,'शत्रुओंने हमारे राज्यको छीन लिया है, ऐसे अवसरपर यदि हम अपने कर्तव्यको समझकर अपने लाभके लिये ही युद्ध करें तो भी इसके लिये जगत्में हमारी प्रशंसा ही होगी, निन््दा नहीं होगी
敵が我らの国を奪い去ったこの時、もし我らが義務のしるしをわきまえ、たとえ己の利益のために戦うとしても、世は我らを非難せず、ただ称賛するであろう。
वैशम्पायन उवाच