#::73:.8 #:23::.7 (0) हि 2 7 > यहाँ मूल पाठमें मासका निर्देश करनेके लिये “दशोत्तरे” यह पद आया है, जिसका अर्थ है ग्यारहवें महीनेमें। यह ग्यारहवाँ महीना कौन-सा है? इस विषयमें दो प्रकारके मत उपलब्ध होते हैं। एक मतके अनुसार यहाँ “माघ” मास ग्रहण किया जाना चाहिये; कारण कि वर्षका आरम्भ चैत्रसे होता है, अत: इस क्रमसे गणना करनेपर “माघ” ही ग्यारहवाँ मास निश्चित होता है। दूसरे मतवालोंका कहना यह है कि पहले मार्गशीर्ष माससे वर्षकी गणना होती थी। इसीलिये वह “अग्रहायण” (वर्षका प्रथम मास) कहा जाता है। “मासानां मार्गशीर्षोडहम्” इस वचनसे भी यही सूचित होता है। इस क्रमसे गणना करनेपर “आश्विन मास” ग्यारहवाँ सिद्ध होता है। - इस प्रकार पिटारीमें बंद करके बहा देनेपर भी वह बालक इसलिये नहीं मरा कि वह अमृतसे उत्पन्न कवच और कुण्डल धारण किये हुए था। देखिये इसी अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक। नवाधिकत्रिशततमो< ध्याय: अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक दवा प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नेव काले तु धृतराष्ट्रस्य वै सखा । सूतो5थधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं ययौ,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय राजा धृतराष्ट्रका मित्र अधिरथ सूत अपनी स्त्रीके साथ गंगाजीके तटपर आया
Vaiśampāyana uvāca— etasminn eva kāle tu dhṛtarāṣṭrasya vai sakhā | sūto 'thādhiratha ity eva sadāro jāhnavīṃ yayau ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。「まさにその時、持国王ドリタラーシュトラの友である御者アディラタは、妻とともにジャーフナヴィー(ガンガー)の河畔へ赴いた。」この一句は、宿命の決定的な転回を告げる序幕である。王家に縁ある者が川辺に至り、そこで見いだされるものと、それをいかに受け入れるかが、のちの義務と忠誠、そして道義の緊張を形づくり、ついには大戦へと結実してゆく。
वैशम्पायन उवाच
The verse foregrounds how dharma unfolds through ordinary movements and relationships: a court-affiliated charioteer and friend of the king arrives at the Gaṅgā, and the ethical weight of what follows (acceptance, care, and identity) will shape future obligations and conflicts.
Vaiśampāyana marks the moment when Adhiratha, a sūta and friend of King Dhṛtarāṣṭra, comes with his wife to the bank of the Gaṅgā (Jāhnavī), setting up the subsequent episode traditionally connected with the discovery and upbringing of the child later known as Karṇa.