सत्यवानुवाच अभ्यासगमनादू भीरु पन्थानो विदिता मम | वृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये,उस समय सत्यवानने कहा--भीरु! बार-बार आने-जानेसे यहाँके सभी मार्ग मेरे परिचित हैं। वृक्षोंके भीतरसे दिखायी देनेवाली चाँदनीसे भी मैं रास्तोंकी पहचान कर लेता हूँ
サティヤヴァーンは言った。「おまえ、臆するな。幾度も行き来したゆえ、このあたりの道はすべて私には馴染み深い。木々の間から差す月明かりによっても、道筋を見分けられるのだ。」
मार्कण्डेय उवाच