Sūrya-stava: Dhaumya’s Counsel and the Aṣṭaśata-nāma of Sūrya
हि मय न हुक है ० - धनके लोभसे मनुष्य धनके रक्षककी हत्या कर डालते हैं। तृतीयो<थध्याय: युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येडब्रवीदिदम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शौनकके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठछिर अपने पुरोहितके पास आकर भाइयोंके बीचमें इस प्रकार बोले--
vaiśampāyana uvāca | śaunakenaivam uktas tu kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | purohitam upāgamya bhrātṛmadhye ’bravīd idam ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。シャウナカがそのように語り終えると、クンティーの子ユディシュティラは家の祭司のもとへ赴き、兄弟たちのただ中で次のように告げた。
वैशम्पायन उवाच