Karṇa’s Counsel on Śrī
Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः
प्राक्षिपत् काज्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा | अनेकानेक नदी और झरने वहाँ बहते थे, तथा नाना प्रकारके वृक्ष उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। शुभस्वरूपा स्वाहा देवीने सहसा उस दुर्गग शैलशिखरपर जाकर एक सुवर्णमय कुण्डमें शीघ्रतापूर्वक उस शुक्र (वीर्य)-को डाल दिया
瑞相を具えた女神スヴァーハーは、たちまちその近づき難い険しい岩峰へと急ぎ、黄金の池に「シュクラ」(śukra――精液/雄の精力の種)を素早く注ぎ入れた。そこには無数の川と滝が流れ、さまざまな樹木がその山の美をいよいよ引き立てていた。
मार्कण्डेय उवाच