कामीकवन-समागमः
Kāmyaka Forest Meeting: Kṛṣṇa’s Visit; Mārkaṇḍeya and Nārada Arrive
दिष्टस्त्वं क्षुधितस्याद्य देवैर्भक्षो महाभुज दिष्ट्या कालस्य महतः: प्रिया: प्राणा हि देहिनाम्,“महाबाहो! मैं दीर्घकालसे भूखा बैठा था, आज सौभाग्यवश देवताओंने तुम्हें ही मेरे लिये भोजनके रूपमें भेज दिया है। सभी देहधारियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय होते हैं
「大いなる腕を持つ者よ。われは久しく飢えてここに座していたが、今日、幸いにも神々は汝をわが糧として遣わした。そもそも身を有するすべての者にとって、命ほど愛しいものはない……」
वैशम्पायन उवाच