Jaṭāsura-praveśa, Draupadī-apaharaṇa, and Jaṭāsura-vadha (जटासुरप्रवेशः द्रौपद्यपहरणं च जटासुरवधः)
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशती र्थयात्राके प्रस॑ंगमें सौगन्धिक कमलको लानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १५२ ॥। हि आय ० () हि २ 7 त्रिपठ्चाशदाधिकशततमोब< ध्याय: क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना वैशम्पायन उवाच स गत्वा नलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् । कैलासशिखराभ्याशे ददर्श शुभकाननाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार आगे बढ़नेपर भीमसेनने कैलास पर्वतके निकट कुबेरभवनके समीप एक रमणीय सरोवर देखा, जिसके आस-पास सुन्दर वनस्थली शोभा पा रही थी। बहुत-से राक्षस उसकी रक्षाके लिये नियुक्त थे। वह सरोवर पर्वतीय झरनोंके जलसे भरा था। वह देखनेमें बहुत ही सुन्दर, घनी छायासे सुशोभित तथा अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था
vaiśampāyana uvāca | sa gatvā nalinīṁ ramyāṁ rākṣasair abhirakṣitām | kailāsa-śikharābhyāśe dadarśa śubha-kānanām ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。ビーマセーナはさらに進み、羅刹たちに守られた麗しき蓮の池に至った。カイラーサ山の峰近くで、吉祥なる美しい林を目にしたのである。その池は山の清流に満ち、見目もこの上なく麗しく、濃い木陰に飾られ、さまざまな樹木と蔓草があたり一面に繁っていた。
वैशम्पायन उवाच
Approaching protected or sacred spaces calls for dharmic restraint: power alone is not the right to enter; one must recognize rightful guardianship and act with self-control and propriety.
Bhīmasena reaches a beautiful lotus-lake near Mount Kailāsa and sees an auspicious forest-grove; the lake is guarded by rākṣasas, setting up an encounter about access and protection.