Aṣṭāvakra–Kahoda Upākhyāna: Śvetaketu’s Āśrama, Sarasvatī, and the Origin of Aṣṭāvakra
तो भी तुम शरणागतके त्यागको कैसे अच्छा मानते हो? यह मेरी समझमें नहीं आता। विहंगम! वास्तवमें तुम्हारा यह उद्योग केवल भोजन प्राप्त करनेके लिये है ।। शव्यश्चाप्यन्यथा कर्तुमाहारो5प्यधिकस्त्वया | गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषो5पि वा । त्वदर्थमद्य क्रियतां यच्चान्यदिह काड्क्षसि,परंतु तुम्हारे लिये आहारका प्रबन्ध तो दूसरे प्रकारसे भी किया जा सकता है और वह इस कबूतरकी अपेक्षा अधिक हो सकता है। सूअर, हिरन, भैंसा या कोई उत्तम पशु अथवा अन्य जो कोई भी वस्तु तुम्हें अभीष्ट हो वह तुम्हारे लिये प्रस्तुत की जा सकती है
śyena uvāca | śavyaś cāpy anyathā kartum āhāro 'py adhikas tvayā | govṛṣo vā varāho vā mṛgo vā mahiṣo 'pi vā | tvad-artham adya kriyatāṃ yac cānyad iha kāṅkṣasi ||
鷹は言った。「おまえの食は別の方法で整えられる——しかもこの鳩よりはるかに多く。今日、おまえのために立派な牡牛でも、猪でも、鹿でも、あるいは水牛でも用意させよう。ここで望むものが他にあるなら、それでもよい。鳥よ、おまえの働きはまこと食を得るためにすぎぬ——それなのに、庇護を求めた者を見捨てることを、どうして是とできようか。」
श्येन उवाच