गङ्गाधारणम् (Gaṅgādhāraṇa) — Śiva Bears the Descent of Gaṅgā
क्वचित् कनकसंकाशं क्वचिद् रजतसंनि भम् । क्वचिदजञ्जनपुड्जाभं हिमवन्तमुपागमत्,वहाँके रमणीय जलाशयोंमें पद्मसमूह भरे हुए हैं। सारसोंके मधुर कलरव उस पर्वतीय प्रदेशको सुशोभित कर रहे हैं। हिमालयकी शिलाओंपर किन्नर और अप्सराएँ बैठी हैं। वहाँके वृक्षोंपर चारों ओरसे दिग्गजोंके दाँतोंकी रगड़ दिखायी देती है। हिमालयके इन शिखरोंपर विद्याधरगण विचर रहे हैं। नाना प्रकारके रत्न सब ओर व्याप्त हैं। प्रज्वलित जिह्वावाले भयंकर विषधर सर्प इस गिरिप्रदेशका सेवन करते हैं। यह शैलराज कहीं तो सुवर्णके समान उद्धासित होता है, कहीं चाँदीके समान चमकता है और कहीं कज्जलराशिके समान काला दिखायी देता है। नरश्रेष्ठ भगीरथ उस हिमवान् पर्वतपर गये और घोर तपस्यामें लग गये। उन्होंने सहस्र वर्षोतक फल, मूल और जलका आहार किया। एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर महानदी गंगाने स्वयं साकार होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया
kvacit kanakasaṅkāśaṁ kvacid rajatasaṁnibham | kvacid añjanapuñjābhaṁ himavantam upāgamat ||
ローマシャはヒマヴァットを、移ろう輝きの山として描く。あるところは黄金のごとく煌めき、あるところは白銀のごとく照り、またあるところはコール(黒い眼薬)の山のように暗い。その畏敬すべき地へ高貴なるバギーラタは赴き、苛烈な苦行を引き受けた。
लोगश उवाच
Steadfast austerity (tapas) undertaken with a higher purpose can draw divine grace; disciplined endurance and purity of intent are portrayed as ethically transformative forces capable of benefiting the wider world.
Lomaśa depicts the Himalaya’s varied radiance—golden, silvery, and dark—then recounts how Bhagiratha goes there, performs long austerities on a sparse diet, and after a thousand divine years Gaṅgā appears before him in person.