सगरोपाख्यानम् (Sagara-Upākhyāna): Śiva’s boon and the extraordinary birth of Sagara’s progeny
हसन्तमिव फेनौघै: स्खलन्तं कन्दरेषु च | नानाग्राहसमाकीर्ण नानाद्विजगणान्वितम्,वह फेनोंके समुदायद्वारा मानो अपनी हास्यछटा बिखेर रहा था; और कन्दराओंसे टकराता-सा जान पड़ता था। उसमें नाना प्रकारके ग्राह आदि जलजन्तु भरे हुए थे, तथा बहुत-से पक्षी निवास करते थे
その海は、白泡の奔流をもって、まるで笑っているかのようであり、岩窟や裂け目にぶつかっては、よろめき砕けるかのように見えた。そこには鰐など多種多様な水の生き物が満ち、また数多の鳥の群れが住みついていた。
लोमश उवाच