धृतराष्ट्रस्य बलाबलचिन्ता
Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Strength and Preference for Śama
तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् । निध्नन्तमिव पश्यामि विमर्देडस्मिन् महाहवे,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
vaiśaṃpāyana uvāca |
tam arjunaṃ maheṣvāsaṃ mahendropendravikramam |
nidhnaṃtam iva paśyāmi vimarde 'smin mahāhave ||
ヴァイシャンパーヤナは言った。「この大いなる戦の揉み合いの中で、わたしには、マヘーンドラ(インドラ)とウペーンドラ(ヴィシュヌ)に等しい武威をもつ大弓手アルジュナが、敵を打ち倒しているかのように見える。」
वैशम्पायन उवाच
The verse frames martial excellence within a moral horizon: Arjuna’s power is portrayed as awe-inspiring and almost divine, suggesting that when strength is aligned with dharma and disciplined purpose, it becomes a force that can decisively protect order against aggression.
The narrator Vaiśaṃpāyana describes Arjuna in the context of an impending or envisioned great battle, picturing him as if already engaged in the melee and cutting down foes—his valor likened to Indra and Viṣṇu to convey unmatched battlefield dominance.