Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्न जिघांसति । रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे
brāhmaṇasvānī ca ādatte brāhmaṇāṁś ca jighāṁsati | ramate nindayā ca eṣāṁ praśaṁsāṁ nābhinandati ||
ヴィドゥラは言う。滅びへ向かう者には明白な徴がある――バラモンの財を奪い、さらにはバラモンを殺そうとさえ望む。彼は彼らを貶めることに喜び、彼らへの称賛を聞いても歓ばない。この倫理的警告が示すのは、徳ある者への敵意と、聖なる学知およびその担い手への侮りは、単なる社会的過失ではなく、内なる崩壊の兆しであり、自己破滅へと至るということだ。
विदुर उवाच