अग्निस्तुति, इन्द्रदर्शन, नहुष-भयवर्णन
Agni-hymn, discovery of Indra, and the Nahuṣa threat
त्वय्यापो निहिता: सर्वास्त्वयि सर्वमिदं जगत् । न ते>स्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु पावक,पावक! आपमें ही सारा जल संचित है। आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो
tvayy āpo nihitāḥ sarvāstvayi sarvam idaṃ jagat | na te 'sty aviditaṃ kiṃcit triṣu lokeṣu pāvaka pāvaka ||
おおパーヴァカよ!あらゆる水は汝のうちに蔵され、この全世界もまた汝のうちに安住する。ゆえに三界において、汝の知らぬものは何一つない。
शल्य उवाच