उद्योगपर्व अध्याय १३३ — संजये मातृउपदेशः
Udyoga Parva Adhyaya 133 — A Mother’s Counsel to Saṃjaya
अपारे भव न: पारमप्लवे भव न: प्लवः । कुरुष्व स्थानमस्थाने मृतान् संजीवयस्व न:,एकशगत्रुवधेनैव शूरो गच्छति विश्रुतिम् एक शत्रुका वध करनेसे ही शूरवीर पुरुष सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात हो जाता है। देवराज इन्द्र केवल वृत्रासुरका वध करके ही “महेन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हो गये। उन्हें रहनेके लिये इन्द्रभवन प्राप्त हुआ और वे तीनों लोकोंके अधीश्वर हो गये
apāre bhava naḥ pāram aplave bhava naḥ plavaḥ | kuruṣva sthānam asthāne mṛtān saṃjīvayasva naḥ | ekaśatrūvadhenaiva śūro gacchati viśrutim |
「岸なき広がりにあっては、われらの彼岸となれ。舟なきときは、われらの舟となれ。足場なきところに確かな足場を作り、倒れた者らを、死者を甦らせるかのように生き返らせよ。敵をただ一人討つだけでも、英雄は広く名声を得るのだ。」
पुत्र उवाच